.......सरिता-सागर........
सागर तुझमें एसा क्या है...?
सरिता तुझपे मरती है |
अपना सब कुछ बलिहारी कर,
आकर तुझसे मिलती है ||
प्रेम का कैसा बंधन है,
दोनों दिन रात तड़पते हैं |
अपना तन-मन अर्पण कर,
इक दूजे पर मरते हैं ||
सरिता अपने प्रियतम के,
बाहों में खो जाने को |
चलती रहती है प्रति पल,
निज अस्तित्व मिटाने को ||
पर्वत से चलकर खाड़ी में,
सरिता सागर मिलन हुआ |
मिलकर अपनी सरिता से,
सागर कितना मगन हुआ ||
कवि हिमांशु पाण्डेय
9415 580 588
सागर तुझमें एसा क्या है...?
सरिता तुझपे मरती है |
अपना सब कुछ बलिहारी कर,
आकर तुझसे मिलती है ||
प्रेम का कैसा बंधन है,
दोनों दिन रात तड़पते हैं |
अपना तन-मन अर्पण कर,
इक दूजे पर मरते हैं ||
सरिता अपने प्रियतम के,
बाहों में खो जाने को |
चलती रहती है प्रति पल,
निज अस्तित्व मिटाने को ||
पर्वत से चलकर खाड़ी में,
सरिता सागर मिलन हुआ |
मिलकर अपनी सरिता से,
सागर कितना मगन हुआ ||
कवि हिमांशु पाण्डेय
9415 580 588
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